आओ करुणावतार!
श्रीसोहनलाल द्विवेदो आयो फिर से करुणावतार !
बट-तरु-तर हृदय अधीर लिए, है खड़ी सुजाता खीर लिए;
खोले कुटिया के बन्द द्वार,
आओ फिर से
करुणावतार ! सिर छत्र, किन्तु है हृदय शोक, बैठे हैं, फिर
चिन्तित अशोक;
रण की जय-श्री वर रही हार,
आओ फिर से
करुणावतार ! भर रहे रक्त से समर-कूप, मानव ने दानव धरा रूप
डूबती धरा को लो उबार आओ फिर से करुणावतार !
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